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₹11 हजार के कैंसर इंजेक्शन का बिल ₹1.30 लाख! दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

₹11 हजार के कैंसर इंजेक्शन का बिल ₹1.30 लाख! दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

₹11 हजार के कैंसर इंजेक्शन का बिल ₹1.30 लाख! दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली, 28 अक्टूबर 2026। देश में दवाओं की कीमतों और मरीजों से वसूले जाने वाले चिकित्सा खर्च को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई चर्चा में है। अदालत ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि जब कुछ दवाएं कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं, तो मरीजों को उनके लिए कई गुना अधिक रकम क्यों चुकानी पड़ती है। मामले की सुनवाई के दौरान कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले एक इंजेक्शन का उदाहरण भी सामने आया, जिसकी खरीद कीमत और अस्पताल के बिल में बड़ा अंतर बताया गया।

27 अक्टूबर को हुई सुनवाई की रिपोर्टों के अनुसार, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP), विक्रेताओं को मिलने वाली कीमत और अस्पतालों में मरीजों से वसूले जाने वाले शुल्क के बीच अंतर पर विचार कर रही थी। अदालत ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए और मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

₹11 हजार के इंजेक्शन के लिए ₹1.30 लाख का बिल

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक ऐसा मामला रखा गया, जिसमें कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाले एक इंजेक्शन की कीमत को लेकर गंभीर अंतर बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार, एक मेडिकल वितरक ने अपनी पत्नी के इलाज के लिए जिस इंजेक्शन को लगभग ₹11,000 में उपलब्ध कराने की बात कही, उसी इंजेक्शन के लिए निजी अस्पताल में ₹1.30 लाख का बिल बताया गया।

इस उदाहरण के जरिए अदालत ने यह सवाल उठाया कि दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली रकम में इतना बड़ा अंतर क्यों है। यह एक सुनवाई में सामने आया विशिष्ट मामला है; इसे देश के सभी अस्पतालों या सभी दवाओं की कीमतों का सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए।

केंद्र सरकार से दवाओं की कीमतों पर सवाल

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दवाओं की कीमतों से जुड़ी सरकारी नीति का पक्ष रखा। सरकार की दलील थी कि दवा बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के साथ-साथ दवाओं की उपलब्धता, प्रतिस्पर्धा, उद्योग के विकास और नवाचार जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

अदालत ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या दवाओं की कीमतों के मामले में व्यापक नियंत्रण की व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती। पीठ ने यह भी जानना चाहा कि जब मरीजों के पास इलाज के लिए जरूरी दवाएं खरीदने के अलावा सीमित विकल्प होते हैं, तब अत्यधिक कीमतों के अंतर को रोकने के लिए नियामक व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की व्यवस्था

इस सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू कैंसर की कुछ दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित करने की सरकारी व्यवस्था भी रहा। केंद्र सरकार ने चयनित 137 कैंसर रोधी दवाओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य के 30 प्रतिशत तक ट्रेड मार्जिन की सीमा का उल्लेख किया था। सरकार के अनुसार, इस व्यवस्था से मरीजों को सालाना लगभग ₹2,500 करोड़ की बचत होने का अनुमान है।

अदालत ने सवाल किया कि जब कैंसर की कुछ दवाओं पर ऐसी सीमा लागू की जा सकती है, तो अन्य दवाओं के लिए भी समान प्रकार के नियमन पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह जरूरी है कि 30 प्रतिशत की व्यवस्था को सभी दवाओं पर लागू नियम न समझा जाए। इसका दायरा संबंधित सरकारी नीति और अधिसूचना से निर्धारित होता है।

दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण कैसे काम करता है?

भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, 2013 यानी DPCO का ढांचा मौजूद है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) इस व्यवस्था के तहत निर्धारित दवाओं की कीमतों की निगरानी और संबंधित नियामक कार्य करता है।

कुछ निर्धारित दवाओं पर सरकार की ओर से अधिकतम कीमत तय की जाती है, जबकि अन्य दवाओं के मामले में कीमत निर्धारित करने और उनमें बदलाव करने के अलग नियम लागू होते हैं। इसी अंतर को लेकर अदालत ने सवाल किया कि क्या मौजूदा व्यवस्था मरीजों को अनुचित रूप से अधिक कीमत चुकाने से पर्याप्त सुरक्षा देती है।

मरीजों पर आर्थिक बोझ बना अहम मुद्दा

कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज लंबे समय तक चल सकता है। ऐसे में दवाओं, अस्पताल में भर्ती, जांच और अन्य चिकित्सा सेवाओं पर होने वाला खर्च परिवारों के बजट पर बड़ा असर डाल सकता है।

यदि किसी दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली रकम में बहुत अधिक अंतर है, तो उस अंतर का कारण स्पष्ट होना और नियामक नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि, अस्पताल के कुल बिल में दवा की कीमत के अलावा अन्य सेवाएं या खर्च भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए किसी खास मामले में वास्तविक अंतर समझने के लिए बिल और संबंधित कीमतों का विवरण देखना जरूरी है।

अदालत ने आदेश सुरक्षित रखा, अंतिम फैसला अभी अलग विषय

27 अक्टूबर की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं में दवाओं की कीमतों के नियमन, गैर-निर्धारित दवाओं पर मूल्य नियंत्रण और जेनेरिक दवाओं के नुस्खे जैसे मुद्दे शामिल थे।

आदेश सुरक्षित रखने का मतलब है कि अदालत ने सुनवाई के दौरान अपना अंतिम निर्णय उसी समय घोषित नहीं किया। इसलिए इस खबर के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी दवाओं की कीमतें घटाने या हर दवा पर एक समान ट्रेड मार्जिन लागू करने का अंतिम आदेश दे दिया है।

निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने दवाओं की खरीद कीमत, अस्पतालों में मरीजों से वसूली जाने वाली रकम और मौजूदा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। अब मामले में आगे का घटनाक्रम अदालत के आदेश और केंद्र सरकार की नियामक कार्रवाई पर निर्भर करेगा


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