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महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव: नामांकन के दिन कार-चेज़, श्मशान ड्रामा और लोकतंत्र का हाई-वोल्टेज तमाशा

महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव: नामांकन के दिन कार-चेज़, श्मशान ड्रामा और लोकतंत्र का हाई-वोल्टेज तमाशा

लोकतंत्र किताबों में जितना सीधा लगता है, ज़मीन पर उतना ही टेढ़ा-मेढ़ा निकलता है। महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों का नामांकन दिन इसका ताज़ा सबूत बनकर सामने आया—जहाँ काग़ज़ों की लड़ाई सड़कों पर कार-चेज़ में बदली, सिद्धांतों की बातें श्मशान की चौखट तक जा पहुँचीं, और प्रशासन की घड़ी टिक-टिक करती रही, पर व्यवस्था हांफती दिखी। सच बोलें तो ये कोई फिल्म नहीं थी; ये वही पुराना भारतीय चुनावी थिएटर था—बस इस बार साउंड ज्यादा तेज़ था, और धुएँ में सच्चाई थोड़ी और धुंधली।

नामांकन: लोकतंत्र का पहला दरवाज़ा, और वहीं मची धक्का-मुक्की

चुनाव का नामांकन वह पल होता है जब आम नागरिक, कार्यकर्ता और नेता—सब एक ही लाइन में खड़े होते हैं। काग़ज़, शपथपत्र, दस्तख़त—सब कुछ नियम से। मगर इस बार नियम किताबों में रह गए। कई जगहों पर नामांकन केंद्रों के बाहर भीड़ ने अपना अलग संविधान लिख दिया। समय की पाबंदी काग़ज़ों पर थी, ज़मीन पर नहीं। आख़िरी मिनट की दौड़ में गाड़ियाँ सरपट भागीं, रास्ते कटे, हूटर बजे, और कैमरे घूमते रहे। राजनीति का यह चेहरा नया नहीं, बस हर बार और बेपरवाह हो जाता है।

कार-चेज़: सड़कों पर सत्ता की स्पीड

राजनीति जब सड़क पकड़ ले, तो ट्रैफिक नियम शर्म से नज़रें झुका लेते हैं। नामांकन की डेडलाइन सिर पर थी, और उम्मीदवारों के काफ़िले रेस मोड में। कहीं प्रतिद्वंद्वियों को रोकने की कोशिश, कहीं रास्ता बदलवाने का खेल—कार-चेज़ ने बता दिया कि सत्ता की भूख में ब्रेक कौन लगाता है? पुलिस के इशारे हवा में तैरते रहे, और गाड़ियों की कतारों में लोकतंत्र की धड़कनें तेज़ होती गईं। यह सब देखकर एक बात साफ़ हुई—यहाँ जीत से ज़्यादा, एंट्री मायने रखती है।

श्मशान ड्रामा: जब राजनीति मर्यादा भूल जाए

और फिर आया वह दृश्य, जिसने बहस को आग दे दी। श्मशान—जहाँ शांति की उम्मीद होती है—वहीं राजनीति का शोर गूंजा। आरोप-प्रत्यारोप, प्रतीकात्मक कदम, और नैरेटिव की जंग। समर्थकों ने इसे विरोध का अनोखा तरीका बताया, विरोधियों ने मर्यादा का उल्लंघन। सच? सच हमेशा की तरह बीच में कहीं दब गया। पर सवाल कायम रहा—क्या चुनावी संदेश देने के लिए कोई जगह पवित्र नहीं बची?

प्रशासन बनाम अफ़रातफ़री

प्रशासन ने बयान दिए, दिशानिर्देश दोहराए, और कैमरों के सामने संयम का पाठ पढ़ाया। मगर ज़मीनी तस्वीरें कुछ और कहती रहीं। कहीं भीड़ नियंत्रण ढीला, कहीं समय प्रबंधन फेल, तो कहीं नियमों की व्याख्या पर बहस। अधिकारी कहते रहे—“सब नियंत्रण में है।” जनता पूछती रही—“तो ये सब क्या है?” लोकतंत्र में भरोसा शब्दों से नहीं, व्यवस्था से बनता है।

दलों की रणनीति: शोर, सिंबल और सोशल मीडिया

राजनीतिक दलों ने इस अराजकता को अपने-अपने चश्मे से देखा। किसी ने इसे उत्पीड़न कहा, किसी ने प्रतिरोध। सोशल मीडिया पर क्लिप्स वायरल हुईं, कैप्शन धारदार बने, और ट्रेंड्स ने सच्चाई को छोटे-छोटे टुकड़ों में परोस दिया। आज की राजनीति में नैरेटिव आधी लड़ाई जीत लेता है—बाक़ी आधी पोलिंग बूथ पर तय होती है।

कार्यकर्ता और मतदाता: बीच में फंसा आम आदमी

सबसे ज़्यादा पिसा कौन? वही पुराना—आम आदमी। कार्यकर्ता जो सुबह से रात तक लाइन में खड़े रहे, मतदाता जो पूछता है कि “ये सब देखकर वोट किसे दूँ?” लोकतंत्र का बोझ आख़िरकार उन्हीं कंधों पर आता है जो शोर नहीं मचाते, बस उम्मीद लगाए रहते हैं।

Maharashtra civic polls: Car chases, crematorium drama cap nomination chaos  - The Economic Times
महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव: नामांकन के दिन कार-चेज़, श्मशान ड्रामा और लोकतंत्र का हाई-वोल्टेज तमाशा

परंपरा बनाम तमाशा

हमारे बुज़ुर्ग कहते थे—चुनाव सेवा का माध्यम है। आज के दृश्य कहते हैं—चुनाव एक तमाशा भी है। परंपरा अनुशासन सिखाती है; तमाशा भीड़ खींचता है। सवाल यह है कि हम किसे चुन रहे हैं? नियमों की लकीरें या शोर की स्याही?

कानून का राज या ताक़त का प्रदर्शन?

जब नामांकन जैसे बुनियादी चरण में ताक़त का प्रदर्शन दिखे, तो कानून का राज सवालों के कटघरे में आता है। क्या नियम सबके लिए बराबर हैं? क्या समय सीमा सच में समय सीमा है? और अगर नहीं, तो सुधार कहाँ से शुरू होगा?

आगे का रास्ता: ठंडा दिमाग़, साफ़ खेल

सच बोलें तो यह कोई अंतिम अध्याय नहीं। चुनाव अभी बाकी हैं, और सुधार भी। ज़रूरत है—कठोर लेकिन निष्पक्ष अमल की, टेक्नोलॉजी के बेहतर इस्तेमाल की, और राजनीतिक दलों की सामूहिक ज़िम्मेदारी की। नामांकन को डिजिटल बनाइए, सुरक्षा बढ़ाइए, और उल्लंघन पर त्वरित कार्रवाई कीजिए। बातें नहीं, काम।

निष्कर्ष: लोकतंत्र को ड्रामा नहीं, गरिमा चाहिए

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों का यह नामांकन-ड्रामा हमें आईना दिखाता है। कार-चेज़, श्मशान विवाद और अफ़रातफ़री—ये सब सुर्खियाँ बन सकती हैं, पर मिसाल नहीं। लोकतंत्र की असली जीत शांति में है, नियमों में है, और उस भरोसे में है जो हर वोटर के दिल में पलता है। शोर कम हो, काम ज़्यादा—यही पुरानी सीख है, और आज भी उतनी ही ज़रूरी।


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